Will Questions Arise On Modi Government’s Lockdown Policy, Experts Are Not Understanding The Steps Of The Government – क्या मोदी सरकार की लॉकडाउन पॉलिसी पर उठेंगे सवाल, विशेषज्ञों को समझ में नहीं आ रहे हैं सरकार के कदम

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कोविड-19 संक्रमण की चर्चा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुख्यमंत्रियों से पांचवी बार की चर्चा में कई मुख्यमंत्रियों के सुर बदले नजर आए। कुछ ने लॉकडाउन की वकालत की, कुछ ने ढील देने की वकालत की, कुछ ने रेल यातायात शुुरू करने पर ऐतराज जताया। 

प्रधानमंत्री के चेहरे पर भी अप्रवासी गरीब, मजदूरों को उनके घर जाने के मामले में ढील देने का तनाव दिखा। यह तनाव अब विशेषज्ञों के भी चेहरे पर दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार लॉकडाउन का चाहे जितना फायदा गिनाए, लेकिन देश की व्यवस्था को समझने वालों इसका नुकसान कुछ ज्यादा समझ में आ रहा है।

पूर्व विदेश सचिव शशांक भी इस पर सवाल उठाते हैं। जानेमाने कार्टूनिस्ट, शिक्षा से एमबीबीएस राजेन्द्र धोड़पकर को भी लॉकडाउन का कोई फायदा समझ में नहीं आया। बिजनेस टीवी चैनल के हेड और प्रतिष्ठित पत्रकार को भी लॉकडाउन पॉलिसी में खामी दिखाई दे रही है। अर्थशास्त्री गुरुचरण दास को भी लॉकडाउन पॉलिसी पर काफी कुछ कहना है। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री, गृहमंत्री पी चिदंबरम भी केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत अपनी चिंता जताकर सुझाव देते रहे हैं।

ऐसा लॉकडाउन क्यों

राजेन्द्र धोड़पकर का कहना है कि सरकार फरवरी महीने में लॉकडाउन करती, तब ठीक था। पूर्व विदेश सचिव शशांक के अनुसार सरकार ने 25 मार्च 2020 से कुछ घंटे की मोहलत देकर बिना किसी तैयारी इसकी घोषणा कर दी। न स्वास्थ्य सेवा की रणनीति बनाई, न मध्य वर्ग, एमएसएमई की समस्या को सोचा और न ही गरीब, मजदूर की स्थिति का आकलन किया। 

इस दौरान 30 जनवरी से कोई 14 लाख लोग विदेश से आए और गए। धोड़पकर का कहना है कि दुनिया के देशों ने लॉकडाउन की रणनीति अपनाई। इस दौरान उन्होंने कोविड-19 के संक्रमितों की जांच की, इलाज किया और संक्रमण फैलने से रोका। हमारे यहां इसके विपरीत हो गया। हम लॉकडाउन ऐसे समय में खोलने जा रहे हैं, जब संक्रमण फैल रहा है। हर दिन चार हजार संक्रमित की संख्या सामने आ रही है। अभी भी गरीब-मजदूर को लेकर राज्यों, केंद्र सरकार में अलग-अलग सोच दिखाई दे रही है।

पहले डराया, अब साथ जीने का संदेश

शशांक और धोड़पकर का कहना है कि केंद्र सरकार ने पहले कोविड-19 संक्रमण को लेकर लोगों में भय बिठाया। लोग घबरा गए। लॉकडाउन लागू किया तो गरीब, मजदूर की चिंता नहीं की। गरीब-मजदूर विषम परिस्थितियां देखकर घर-गांव की तरफ चल दिया। सरकार का साधन मिला तो ठीक, नहीं मिला तो पैदल। ऐसा कदम कोई घबराहट में ही उठाता है। अब वह घर जा रहा है तो इतनी जल्दी नहीं लोटेगा। गरीब, मजदूर नहीं रहेगा तो शहरी जीवन, कल कारखाना, उद्योग, कारोबार सब कैसे शुरू हो पाएंगे। लिहाजा अब सरकार दबाव में मजदूरों को रोकने के लिए आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने, लॉकडाऊन में ढील देने समेत पहल हो रही है।

‘अब तो चार हजार मामले रोज आ रहे’

बिजनेस चैनल हेड ने कहा कि प्रधानमंत्री ने खुद अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि संक्रमण को गांवों तक न पहुंचने दें। जब लॉकडाउन लगा था, तब सरकार चाह रही थी कि कोविड-19 का संक्रमण जिलों तक न पहुंचने पाए। इससे साफ है कि सरकार पहले चरण में फेल हो गई। न जांच के व्यापक इंतजाम हो पाए, न स्वास्थ्य समेत अन्य व्यवस्था ढर्रे पर चल पाई। नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि अभी सवाल खड़ा करने का समय नहीं है, लेकिन जो स्थितियां दिखाई दे रही हैं, वह डराती हैं। अब तो चार हजार की दर से रोज संक्रमित बढ़ रहे हैं। सौ के करीब संक्रमण से आदमी की जान जा रही है। ऐसे में लोगों की आवाजाही बढऩे से खतरा कम होने का तर्क कैसे दिया जा सकता है।

दुनिया के रिसर्चर से पढ़ लिया लॉकडाउन लगा दिया

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है दुनिया के रिसर्चर से पढ़ लिया तो बिना सोचे-समझे लॉकडाउन लगा दिया। विश्व गुरू बनने का सपना देखने वाले देश ने लॉकडाउन से छूट भी दी तो पहले शराब की दुकानें खोल दी। प्रवासी मजदूरों को लेकर भी कोई नीति समझ में नहीं आई। लगता है कि सरकार खुद ही रुपये-पैसे के हिसाब किताब में उलझ गई है। 

शशांक का कहना है कि पहले तो कहा कि जान है, जहान है। अब कहा जा रहा कोविड-19 संक्रमण, जहान और जान के साथ जिओ। लग रहा है कि केंद्र सरकार दबाव, भ्रम और तालमेल की कमी में उलझ गई है। अमेरिका, यूरोप, कोरिया समेत दुनिया को देखिए तो यहां कुछ चीजें समझ में कम आ रही हैं।



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