How Children Will Be Safe In Schools After The Pandemic Transition Period, Many Options Being Discussed – संक्रमण काल के बाद स्कूलों में कैसे सुरक्षित रहेंगे बच्चे, स्कूल चलाने के कई विकल्पों पर हो रहा विचार

0
32


ख़बर सुनें

महामारी के काल में बच्चों की शिक्षा को आगे बढ़ाना शिक्षाविदों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इस समय ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा देने की कोशिश हो रही है, लेकिन शिक्षाविदों की राय है कि लंबे समय में यह पढ़ाई का स्थाई विकल्प नहीं बन सकता।

ऐसे में बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखते हुए स्कूलों में उनकी शिक्षा सुनिश्चित कराने के तरीकों पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। कुछ शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों में शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए स्कूल को तीन पारियों में चलाया जा सकता है।

इससे स्कूलों में एक बार में बच्चों की संख्या सीमित रहेगी और उनमें शारीरिक दूरी बनाए रख पाना संभव हो सकेगा।

लेकिन इस माध्यम में बच्चों को बार-बार स्कूलों तक ले आने और वापस ले जाने का खर्च बढ़ेगा। अध्यापकों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। ऐसे में यह भार कौन वहन करेगा, यह भी इस मामले में चिता का एक बड़ा विषय है।

इसी प्रकार बच्चों के अलग-अलग वर्ग को ऑड-ईवन योजना के तहत स्कूलों में बुलाए जाने का विकल्प भी सुझाया जा रहा है। इसके तहत कक्षा के बच्चों में शारीरिक दूरी बनाए रखी जा सकेगी।

हमदर्द पब्लिक स्कूल, दिल्ली की प्रिंसिपल सहर सैयद कहती हैं कि उनके लिए बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखना सबसे पहली प्राथमिकता है। उनका मानना है कि कोरोना संक्रमण का खतरा खत्म होने तक बच्चों को ऑनलाइन विकल्प से ही पढ़ाया जाना चाहिए।

इस दौरान बच्चों की शिक्षा पुस्तक आधारित करने की बजाय एक्टिविटी आधारित करनी चाहिए, जिससे बच्चों में करके सीखने की प्रवृत्ति विकसित हो सके। उनका मानना है कि अभिभावकों के सहयोग से यह विधि ज्यादा कारगर साबित हो सकती है।

अगर बच्चों के पाठ्यक्रम को परिवर्तित करने की भी आवश्यकता पड़ती है, तो यह किया जा सकता है। पुस्तकीय पाठ्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा एक्टिविटी आधारित कार्यक्रमों को बढ़ाया जा सकता है। इससे बच्चों के सीखने की क्षमता में लगातार विकास होता रहेगा। कुछ अन्य विषयों के लिए ऑनलाइन विकल्प को जारी रखना चाहिए।

वहीं, इंटरनेशनल यूनाइटेड एजुकेशनिस्ट फ्रैटर्निटी के चेयरमैन जयंत चौधरी का कहना है कि अगर कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाए रखने के लिए छह महीने स्कूलों को बंद भी रखना पड़े, तो यह बुरा फैसला नहीं है।

उन्होंने कहा कि फ्रांस ने अपने यहां स्कूलों को खोलने की कोशिश की और बच्चों को तमाम सावधानियों के साथ स्कूलों में भेजा गया। लेकिन पूरी सावधानी के बाद भी बच्चे संक्रमित हो गए।

उन्होंने कहा कि हमारा समाज और व्यवस्था संक्रमण के प्रति उतनी जागरूक नहीं है, इसलिए स्कूलों को खोलना खतरनाक हो सकता है।

क्या बच्चे कर सकेंगे भरपाई

उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम का वितरण इस प्रकार का है कि अगर बच्चों को कुछ समय के रोक के बाद भी दोबारा शिक्षा जारी की जाए, तो इससे उनके सीखने की क्षमता पर किसी प्रकार का असर नहीं पड़ेगा।

इस दौरान सीमित कक्षाओं और ऑनलाइन पाठ्यक्रम के जरिए बच्चों की निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है।

बढ़ी कीमत कौन वहन करेगा

अगर एक तिहाई बच्चों को एक बार में स्कूल में शिक्षा देने का विकल्प अपनाया जाता है, तो इससे बच्चों को तीन शिफ्ट में स्कूल लाना और छोड़ना पड़ेगा। टीचर्स को भी अलग-अलग समय के हिसाब से स्कूल आने-जाने की मजबूरी हो सकती है।

ऐसे में स्कूल बसों का खर्च बढ़ेगा। स्कूल के प्रधानाध्यापकों की चिंता है कि ऐसी स्थिति में यह भार कौन वहन करेगा?

सीबीएसई तैयार

वहीं, देश की शिक्षा व्यवस्था में अहम स्थान रखने वाली संस्था सीबीएसई की प्रवक्ता रमा शर्मा ने कहा कि वे सरकार के गाइड लाइन का इंतजार कर रही हैं।

सरकार जिस माध्यम से भी शिक्षा देने की रणनीति अपनाने की घोषणा करेगी, सीबीएसई उसका पालन करेगी। फिलहाल अभी तक उन्हें सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

वर्तमान में शिक्षा के सामने चैलेंज

  • बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखना इस समय का सबसे बड़ी चुनौती है। अगर एक भी बच्चा कोरोना संक्रमित हो जाता है तो उससे पूरी क्लास को और उन बच्चों के माध्यम से पूरे परिवार को संक्रमित होने का बड़ा खतरा है।
  • बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा देने का विकल्प खूब चलन में आ रहा है। लेकिन यह पद्धति उन गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित रख सकती है, जो गरीब वर्ग से आते हैं और जिनके पास संसाधनों की भारी कमी है।
  • गांव के दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान कर पाना बड़ी चुनौती बन सकता है जहां इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
  • सीमित संसाधनों वाले राज्यों में कम बच्चों के साथ स्कूलों को चलाने का विकल्प व्यावहारिक नहीं हो सकता है।

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति

जिला स्तरीय शिक्षा संबंधी आंकड़े (The Unified District Information System, U-DISE) के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा देने वाले 80 फीसदी स्कूल सरकारी हैं या सरकार के आर्थिक सहयोग से चलते हैं।

6 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के लगभग 29 फीसदी बच्चे प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को ‘मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 (Free And Compulsory Education Act 2009) के तहत शिक्षा मिलना अनिवार्य कर दिया गया है।

प्राथमिक शिक्षा में बच्चों के नामांकन की दर कई राज्यों में 93 से 95 फीसदी तक पहुंच गई है। लेकिन इसके बाद भी 10 वर्ष तक की आयु के आधे बच्चे प्राइमरी स्तर तक की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते।

बच्चों के खराब शिक्षा के स्तर के पीछे लगभग 25 फीसदी शिक्षकों की प्रतिदिन अनुपस्थिति पाई गई है। जबकि बच्चों और शिक्षक का अनुपात 35:1 है जो आरटीई कानून के 30:1 के लगभग करीब है। आंकड़ों के मुताबिक केवल 69 फीसदी शिक्षक स्नातक स्तर तक की डिग्री धारण करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में जब सामान्य विधि से बच्चों को शिक्षा देना संभव नहीं हो पा रहा है तो केवल ऑनलाइन विकल्पों के जरिए या स्कूलों में बेहद कम बच्चों को लाकर सभी बच्चों को शिक्षा देने में कई मुश्किलें सामने आ सकती हैं।

अगर ऐसा किया जाता है तो इससे देश की बड़ी आबादी में बच्चों को शिक्षा से वंचित होना पड़ सकता है या उनकी शिक्षा के स्तर पर गहरा असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को इसके बीच का कोई रास्ता तलाश करना पड़ेगा जिससे बच्चों की शिक्षा भी जारी रहे और उन्हें कोरोना संक्रमण से भी बचाया जा सके।

सार

  • बच्चों को ऑड-ईवन सिस्टम से पढ़ाने से लेकर एक बार में तीस फीसदी बच्चों को लेकर स्कूल चलाने के विकल्पों पर हो रहा विचार
  • पुस्तकीय पाठ्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा एक्टिविटी आधारित कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए
  • फ्रांस ने स्कूलों को खोलने की कोशिश की और बच्चों को तमाम सावधानियों के बावजूद बच्चे संक्रमित हो गए

विस्तार

महामारी के काल में बच्चों की शिक्षा को आगे बढ़ाना शिक्षाविदों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इस समय ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा देने की कोशिश हो रही है, लेकिन शिक्षाविदों की राय है कि लंबे समय में यह पढ़ाई का स्थाई विकल्प नहीं बन सकता।

ऐसे में बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखते हुए स्कूलों में उनकी शिक्षा सुनिश्चित कराने के तरीकों पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। कुछ शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों में शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए स्कूल को तीन पारियों में चलाया जा सकता है।

इससे स्कूलों में एक बार में बच्चों की संख्या सीमित रहेगी और उनमें शारीरिक दूरी बनाए रख पाना संभव हो सकेगा।

लेकिन इस माध्यम में बच्चों को बार-बार स्कूलों तक ले आने और वापस ले जाने का खर्च बढ़ेगा। अध्यापकों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। ऐसे में यह भार कौन वहन करेगा, यह भी इस मामले में चिता का एक बड़ा विषय है।

इसी प्रकार बच्चों के अलग-अलग वर्ग को ऑड-ईवन योजना के तहत स्कूलों में बुलाए जाने का विकल्प भी सुझाया जा रहा है। इसके तहत कक्षा के बच्चों में शारीरिक दूरी बनाए रखी जा सकेगी।

हमदर्द पब्लिक स्कूल, दिल्ली की प्रिंसिपल सहर सैयद कहती हैं कि उनके लिए बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखना सबसे पहली प्राथमिकता है। उनका मानना है कि कोरोना संक्रमण का खतरा खत्म होने तक बच्चों को ऑनलाइन विकल्प से ही पढ़ाया जाना चाहिए।

इस दौरान बच्चों की शिक्षा पुस्तक आधारित करने की बजाय एक्टिविटी आधारित करनी चाहिए, जिससे बच्चों में करके सीखने की प्रवृत्ति विकसित हो सके। उनका मानना है कि अभिभावकों के सहयोग से यह विधि ज्यादा कारगर साबित हो सकती है।

अगर बच्चों के पाठ्यक्रम को परिवर्तित करने की भी आवश्यकता पड़ती है, तो यह किया जा सकता है। पुस्तकीय पाठ्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा एक्टिविटी आधारित कार्यक्रमों को बढ़ाया जा सकता है। इससे बच्चों के सीखने की क्षमता में लगातार विकास होता रहेगा। कुछ अन्य विषयों के लिए ऑनलाइन विकल्प को जारी रखना चाहिए।

वहीं, इंटरनेशनल यूनाइटेड एजुकेशनिस्ट फ्रैटर्निटी के चेयरमैन जयंत चौधरी का कहना है कि अगर कोरोना संक्रमण से बच्चों को बचाए रखने के लिए छह महीने स्कूलों को बंद भी रखना पड़े, तो यह बुरा फैसला नहीं है।

उन्होंने कहा कि फ्रांस ने अपने यहां स्कूलों को खोलने की कोशिश की और बच्चों को तमाम सावधानियों के साथ स्कूलों में भेजा गया। लेकिन पूरी सावधानी के बाद भी बच्चे संक्रमित हो गए।

उन्होंने कहा कि हमारा समाज और व्यवस्था संक्रमण के प्रति उतनी जागरूक नहीं है, इसलिए स्कूलों को खोलना खतरनाक हो सकता है।

क्या बच्चे कर सकेंगे भरपाई

उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में पाठ्यक्रम का वितरण इस प्रकार का है कि अगर बच्चों को कुछ समय के रोक के बाद भी दोबारा शिक्षा जारी की जाए, तो इससे उनके सीखने की क्षमता पर किसी प्रकार का असर नहीं पड़ेगा।

इस दौरान सीमित कक्षाओं और ऑनलाइन पाठ्यक्रम के जरिए बच्चों की निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की जा सकती है।

बढ़ी कीमत कौन वहन करेगा

अगर एक तिहाई बच्चों को एक बार में स्कूल में शिक्षा देने का विकल्प अपनाया जाता है, तो इससे बच्चों को तीन शिफ्ट में स्कूल लाना और छोड़ना पड़ेगा। टीचर्स को भी अलग-अलग समय के हिसाब से स्कूल आने-जाने की मजबूरी हो सकती है।

ऐसे में स्कूल बसों का खर्च बढ़ेगा। स्कूल के प्रधानाध्यापकों की चिंता है कि ऐसी स्थिति में यह भार कौन वहन करेगा?

सीबीएसई तैयार

वहीं, देश की शिक्षा व्यवस्था में अहम स्थान रखने वाली संस्था सीबीएसई की प्रवक्ता रमा शर्मा ने कहा कि वे सरकार के गाइड लाइन का इंतजार कर रही हैं।

सरकार जिस माध्यम से भी शिक्षा देने की रणनीति अपनाने की घोषणा करेगी, सीबीएसई उसका पालन करेगी। फिलहाल अभी तक उन्हें सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

वर्तमान में शिक्षा के सामने चैलेंज

  • बच्चों को कोरोना संक्रमण से बचाए रखना इस समय का सबसे बड़ी चुनौती है। अगर एक भी बच्चा कोरोना संक्रमित हो जाता है तो उससे पूरी क्लास को और उन बच्चों के माध्यम से पूरे परिवार को संक्रमित होने का बड़ा खतरा है।
  • बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा देने का विकल्प खूब चलन में आ रहा है। लेकिन यह पद्धति उन गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित रख सकती है, जो गरीब वर्ग से आते हैं और जिनके पास संसाधनों की भारी कमी है।
  • गांव के दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान कर पाना बड़ी चुनौती बन सकता है जहां इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
  • सीमित संसाधनों वाले राज्यों में कम बच्चों के साथ स्कूलों को चलाने का विकल्प व्यावहारिक नहीं हो सकता है।

प्राथमिक शिक्षा की स्थिति

जिला स्तरीय शिक्षा संबंधी आंकड़े (The Unified District Information System, U-DISE) के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा देने वाले 80 फीसदी स्कूल सरकारी हैं या सरकार के आर्थिक सहयोग से चलते हैं।

6 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के लगभग 29 फीसदी बच्चे प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को ‘मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 (Free And Compulsory Education Act 2009) के तहत शिक्षा मिलना अनिवार्य कर दिया गया है।

प्राथमिक शिक्षा में बच्चों के नामांकन की दर कई राज्यों में 93 से 95 फीसदी तक पहुंच गई है। लेकिन इसके बाद भी 10 वर्ष तक की आयु के आधे बच्चे प्राइमरी स्तर तक की पुस्तकें नहीं पढ़ पाते।

बच्चों के खराब शिक्षा के स्तर के पीछे लगभग 25 फीसदी शिक्षकों की प्रतिदिन अनुपस्थिति पाई गई है। जबकि बच्चों और शिक्षक का अनुपात 35:1 है जो आरटीई कानून के 30:1 के लगभग करीब है। आंकड़ों के मुताबिक केवल 69 फीसदी शिक्षक स्नातक स्तर तक की डिग्री धारण करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में जब सामान्य विधि से बच्चों को शिक्षा देना संभव नहीं हो पा रहा है तो केवल ऑनलाइन विकल्पों के जरिए या स्कूलों में बेहद कम बच्चों को लाकर सभी बच्चों को शिक्षा देने में कई मुश्किलें सामने आ सकती हैं।

अगर ऐसा किया जाता है तो इससे देश की बड़ी आबादी में बच्चों को शिक्षा से वंचित होना पड़ सकता है या उनकी शिक्षा के स्तर पर गहरा असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को इसके बीच का कोई रास्ता तलाश करना पड़ेगा जिससे बच्चों की शिक्षा भी जारी रहे और उन्हें कोरोना संक्रमण से भी बचाया जा सके।



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here