Bombay Highcourt Says, The Principle Of No Work, No Salary Cannot Apply Now – अभी नहीं लागू हो सकता ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत: बॉम्बे हाईकोर्ट

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Updated Thu, 14 May 2020 04:55 AM IST

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देश में इस वक्त लॉकडाउन की वजह से रोजगार प्रभावित हुआ है। काम धंधे बंद हैं। ऐसी स्थिति में कई कंपनियां ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू करते हुए अपने कर्मचारियों को वेतन देने से कतरा रही हैं। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने अपने एक आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि कोरोना संकट के इस दौर में ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस आरवी घुगे ने कहा कि ‘पहली नजर में लगता है कि इस तरह की असाधारण परिस्थितियों में ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता है। उन्होंने औरंगाबाद के तुलजा भवानी मंदिर संस्थान ट्रस्ट को निर्देश दिया कि वह सुनिश्चित करे कि उसके सभी ठेका मजदूरों को मई महीने तक पूरा भुगतान किया जाए।

अदालत ठेका मजदूर संघ ‘राष्ट्रीय श्रमिक अघाड़ी’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उस्मानाबाद के जिलाधिकारी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष और तहसीलदार इसके प्रबंधक हैं।

याचिका में दावा किया गया था कि लॉकडाउन के बावजूद ठेका मजदूरों ने मंदिर संस्थान में काम करने की इच्छा जताई थी। जबकि, ट्रस्ट ने उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दी। मार्च और अप्रैल के महीनों में किए भुगतान की राशि जनवरी और फरवरी में किए गए भुगतान से कम थी।

देश में इस वक्त लॉकडाउन की वजह से रोजगार प्रभावित हुआ है। काम धंधे बंद हैं। ऐसी स्थिति में कई कंपनियां ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू करते हुए अपने कर्मचारियों को वेतन देने से कतरा रही हैं। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने अपने एक आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि कोरोना संकट के इस दौर में ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस आरवी घुगे ने कहा कि ‘पहली नजर में लगता है कि इस तरह की असाधारण परिस्थितियों में ‘काम नहीं, वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता है। उन्होंने औरंगाबाद के तुलजा भवानी मंदिर संस्थान ट्रस्ट को निर्देश दिया कि वह सुनिश्चित करे कि उसके सभी ठेका मजदूरों को मई महीने तक पूरा भुगतान किया जाए।

अदालत ठेका मजदूर संघ ‘राष्ट्रीय श्रमिक अघाड़ी’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उस्मानाबाद के जिलाधिकारी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष और तहसीलदार इसके प्रबंधक हैं।

याचिका में दावा किया गया था कि लॉकडाउन के बावजूद ठेका मजदूरों ने मंदिर संस्थान में काम करने की इच्छा जताई थी। जबकि, ट्रस्ट ने उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दी। मार्च और अप्रैल के महीनों में किए भुगतान की राशि जनवरी और फरवरी में किए गए भुगतान से कम थी।



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