वो जो हैं अति-संवेदनशीलता के शिकार

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दुनिया में कई लोगों को छोटी छोटी बातों से बहुत फ़र्क़ पड़ता है. ऐसे लोग कुछ ख़ास चीज़ों जैसे रोशनी या तेज़ आवाज़ को लेकर बहुत संवेदनशील होते हैं.

पहले उन्हें सिर्फ़ संवेदनशील कहा जाता था. मगर अब अमरीका समेत कई देशों में हुए रिसर्च के बाद ऐसे लोगों के ज़्यादा संवेदनशील होने को एक बीमारी बताया जा रहा है. इस बीमारी का नाम सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर या एसपीडी है.

कुछ लोग किसी के क़दमों की आहट या शोर-गुल से परेशान हो जाते हैं. वे चीखने लगते हैं. कुछ लोग तेज़ रोशनी को बर्दाश्त नहीं कर पाते.

ऐसे ही लोगों में अमरीका का एक बच्चा है. उसका नाम जैक क्रैवेन है. बेहद तेज़ दिमाग़ वाला जैक, बचपन से ही शोर बर्दाश्त नहीं कर पाता था. वो चीखने लगता था. स्कूल गया तो वहां भी बच्चों के शोर-गुल से उसे भयंकर परेशानी होने लगी. मां लोरी को उसे स्कूल से हटाना पड़ गया.

ऐसी ही एक और बेहद संवेदनशील महिला हैं, अमरीका की रैशेल श्नाइडर. रैशेल को भी लोगों की आवाज़ों से परेशानी होती है. उन्हें किसी के क़दमों की आहट से भी घबराहट होने लगती है. जब वो भीड़ के सामने बोलने के लिए खड़ी होती हैं तो यूं लगता है कि उनका दम निकल जाएगा.

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साल 2010 में पता चला था कि रैशेल को एसपीडी यानी सेंसरी प्रॉसेसिंग डिसॉर्डर है. उस वक़्त उनकी उम्र 27 बरस थी. अब तक का जीवन उन्होंने रोज़ मर-मर के काटी थी. उन्हें ताने सुनने पड़ते थे. बाहर निकलने में डर लगता था.

रैशेल की परेशानी का ये आलम है कि तेज़ रोशनी वाले बल्ब भी उन्हें स्पॉटलाइट लगते हैं. रेडियो पर गाना बज रहा हो तो उसके इको तक से रैशेल को दिक़्क़त हो जाती है. सिपाहियों की क़दमताल तो उनकी जान ही ले लेते है.

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर एलिसा मार्को इस बेहद तेज़ एहसास वाली बीमारी के बारे में जानकारी जुटा रही हैं. उन्होंने हाल ही में ऐसी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को शिकागो बुलाया. और सबको बारी बारी से अपना तजुर्बा बांटने को कहा.

ऐसी परेशानी के शिकार लोगों में ज़्यादातर बच्चे थे. वे अपने मां-बाप के साथ इस बैठक में आए थे. लेकिन रैशेल जैसे लोग भी थे, जिनको बड़े होकर पता चला कि ज़्यादा संवेदनशील होना एक बीमारी है. .

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इस बीमारी का नाम पहले पहल अमरीका के डॉक्टर ज्यां आयर्स ने रखा था. उन्होंने 1960 में इसका नाम सेंसरी इंटीग्रेशन डिसॉर्डर रखा था. ज्यां आयर्स की छात्रा रही लूसी जेन मिलर ने ज्यां के इस बीमारी के बारे में रिसर्च को आगे बढ़ाया. उन्होंने इस बीमारी की तीव्रता नापने के लिए कुछ पैमाने भी ईजाद किए हैं.

वो आजकल पूरी दुनिया में इस बीमारी के बारे में लोगों को आगाह करने के काम में जुटी हैं.

2008 में मिलर ने इस बारे में कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में ही एक प्रेज़ेंटेशन दिया था. इस प्रेज़ेंटेशन को एलिसा मार्को ने भी देखा था. बाद में दोनों ने इस बीमारी पर साथ मिलकर काम करने का फ़ैसला किया. मिलर ने आगे के रिसर्च के लिए पैसों का इंतज़ाम किया. वहीं एलिसा ने मरीज़ जुटाए.

उन्हीं कुछ मरीज़ों में जैक और रैशेल हैं.

2013 में उनके रिसर्च की पहली किस्त छपी. इसमें उन्होंने एसपीडी की जड़ें दिमाग़ में तलाशने की कोशिश की थी. उन्हें पता चला था कि इस बीमारी के शिकार लोगों का दिमाग़, आम लोगों के दिमाग़ से अलग होता है.

दिमाग के इस हिस्से की मदद से हम आवाज़, रोशनी और छुअन को महसूस करते हैं. एसपीडी से पीड़ित लोगों के दिमाग़ का यही हिस्सा कम विकसित था.

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2014 में आए रिसर्च के दूसरे हिस्से ने एक और बात साफ़ की कि एसपीडी का सीधा ताल्लुक़ ऑटिज़्म नाम की बीमारी से होता है. क्योंकि 90 फ़ीसद मरीज़ों में ऑटिज़्म के लक्षण पाए गए.

एलिसा मार्को ये बात पक्के तौर पर जानना चाहती थीं कि क्या ऑटिज़्म का ताल्लुक़ एसपीडी से है. या फिर एसपीडी के शिकार लोगों का ऑटिज़्म की बीमारी होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है.

यूं तो एलिसा और मिलर अपने तजुर्बों से काफ़ी ख़ुश थीं, मगर ज़्यादातर अमरीकी डॉक्टर उनके नतीजों पर भरोसा करने को राज़ी नहीं थे. इनमें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के कुछ सीनियर वैज्ञानिक भी थे.

ऐसे ही लोगों में से एक हैं प्रोफेसर थॉमस बॉयस. वो ये तो मानते हैं कि एसपीडी जैसी कोई चीज़ तो है. मगर ये एक बीमारी है, इसको लेकर वो मुतमईन नहीं. वो ये कहते हैं कि शायद मुझे इस बारे में अभी पूरी समझ नहीं.

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वैसे किसी ख़ास चीज़ से परेशानी नई बात नहीं. बहुत से बच्चे रोशनी या आग या शोर-गुल से घबराकर चीखने लगते हैं. एक सर्वे के मुताबिक़ सोलह फ़ीसद बच्चे ऐसी परेशानी की शिकायत अपने मां-बाप से करते हैं.

हालांकि उम्र बढ़ने के साथ उनकी ये दिक़्क़त दूर हो जाती है. लेकिन, जैक और रैशेल जैसे लोग भी हैं, जो अपने एहसास से बेहाल रहते हैं.

जैक की मां लोरी, उनके पति और बेटी ने तो तय किया है कि वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे या कहेंगे जिससे जैक को परेशानी हो. उसकी बातों को वो ध्यान से सुनते हैं. जैक की पढ़ाई भी अब घर में ही हो रही है.

असल में हमारे एहसास, हमें बाक़ी दुनिया से रूबरू कराते हैं. वो हमें दुनिया दिखाते हैं. आवाज़ें सुनाते हैं. छुअन को महसूस कराते हैं. होता ये है कि हमारा दिमाग़ इन संकेतों को पकड़कर इसे हमें महसूस कराता है.

कुछ लोगों को दूसरों को ख़ुश या परेशान देखकर उनके सुख-दुख का एहसास हो जाता है. कॉमेडी सीरियल देखते वक़्त लोगों को हंसते देखते हैं तो आप भी हंस पड़ते हैं. आस-पास कोई तकलीफ़ में हो तो आपको उससे हमदर्दी हो जाती है.

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एलिसा मार्को ऐसे लोगों को ऑर्किड बुलाती हैं. उनको ज़रा सी बात चुभ जाती है. वे दुख भरी ख़बर सुनकर रोने लगते हैं. कोई मज़ेदार सीरियल देखते वक़्त उनकी हंसी है कि रुकती ही नहीं. उन्हें पार्टियों से ज़्यादा क़िताबों का शौक़ होता है.

अमरीकी मनोवैज्ञानिक एलेन आरोन कहती हैं कि संवेदनशील लोग, भावों को ज़्यादा गहराई से नापते हैं. बातों या चीज़ों को लेकर वो बहुत संवेदनशील होते हैं. दूसरों से उन्हें तुरंत हमदर्दी हो जाती है.

ऐसे बेहद संवेदनशील लोगों के बारे में एलेन के तजुर्बे से एक बात सामने आई है. वे किसी भी हालात को आराम से समझते हैं. तब उस पर कोई प्रतिक्रिया देते हैं. वो आस-पास के माहौल को लेकर भी काफ़ी चौकन्ने रहते हैं. उनके ऊपर दूसरों के मूड तक का असर पड़ता है. एलेन कहती हैं कि दुनिया के बीस फ़ीसद लोग ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.

एलेन की तरह कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के थॉमस बॉयस भी मानते हैं कि बच्चे दो तरह के होते हैं. एक तो वो जो हर माहौल में ढल जाते हैं. मज़े करते हैं. दूसरे वो बच्चे, जिन्हें आगे बढ़ने के लिए एक ख़ास माहौल चाहिए.

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पर एक सवाल वहीं का वहीं है, कि आख़िर एसपीडी के शिकार लोग कहां फ़िट बैठते हैं? एलिसा मानती हैं कि एसपीडी पीड़ित असल में थॉमस बॉयस के तजुर्बे वाले ऑर्किड हैं. वे भावों को मुश्किल से समझते हैं. मगर एक ख़ास माहौल में वो तेज़ी से फलते-फूलते हैं.

लोगों में सेंसिटिव प्रॉसेसिंग डिसऑर्डर का पता लगने के बाद अगला क़दम उनके इलाज का होता है. इसका मक़सद उनके एहसास कम करना नहीं होता. बल्कि कोशिश ये होती है कि आम माहौल में वो कम तकलीफ़ के साथ रह सकें. ज़िंदगी में आगे बढ़ सकें.

एसपीडी पीड़ितों का इलाज दवाओं के साथ ही साथ कंप्यूटर गेम वग़ैरह से भी किया जा रहा है. ख़ुद एलिसा मार्को ने इवो नाम का एक खेल तैयार किया है. हालांकि अभी ये बाज़ार में नहीं आया है. लेकिन, जैक ने ये गेम ख़ेला था. उसकी मां लोरी बताती हैं कि इसके बाद उसके बर्ताव में काफ़ी बदलाव आया है.

फिलहाल तो एसपीडी पर काम कर रहे रिसर्चर और इसके शिकार लोग, इसे एक बीमारी का दर्जा दिलाने, इसके बारे में लोगों को जागरूक करने में जुटे हैं.

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