अगर आपको पता हो आप कब मरेंगे?

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क्या आपको अपनी मौत का दिन मालूम है? नहीं मालूम ना! अगर ऐसा होता कि कोई आपको आपकी मौत का दिन और वक़्त बता देता तो क्या होता? क्या आपकी सोच में कोई फ़र्क़ आता? क्या आप जिंदगी को नए नज़रिए से देखते? जैसे आप आज अपनी ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, उससे अलग हटकर ज़िंदगी जीने की कोशिश करते?

जब लोग मौत के साए में जीते हैं, तो उनकी सोच में, उनके जीने के ढंग में फ़र्क़ आ जाता है.

अमरीका की इवा हैगबर्ग फ़िशर को ही ले लीजिए. वो पीएचडी की छात्रा हैं. वो लेखिका हैं. वो आर्किटेक्चर पर भी लिखती हैं. हाल ही में उनकी दूसरी क़िताब छपी है. पिछले आठ सालों से वो इस ख़ौफ़ के साए में जीती रही हैं कि वो कितने दिन और जिएंगी.

2008 में जब वो न्यूयॉर्क में रह रही थीं तो उन्हें अजीब सा महसूस होना शुरू हुआ. उन्हें चक्कर आते थे. हमेशा प्यास लगी रहती थी. जनवरी में एक दिन वो रात में उठकर किचन में गईं तो यूं लगा कि फ़र्श उठकर उनके पास आता जा रहा है. या फिर वो गिर रही हैं. दिमाग़ में अजीबो-ग़रीब आवाज़ें गूंज रही थीं.

इवा डॉक्टर के पास पहुंचीं. एमआरआई कराया. डॉक्टरों को लगा कि उन्हें ट्यूमर है. उन्होंने इसका इलाज कराया. मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ. इवा को लगा कि वो न्यूयॉर्क में रहने के तनाव से जूझ रही हैं. इसीलिए वो पोर्टलैंड शहर में जाकर रहने लगीं.

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अगले आठ सालों तक वो पोर्टलैंड से बर्कले और फिर सैन फ्रैंसिस्को में रहने की कोशिश करकती रहीं. हर जगह उनकी हालत बद से बदतर होती गई. डॉक्टरों ने इवा पर तमाम तरह के तजुर्बे किए. कभी उन्हें तनाव का शिकार बताया और कभी ट्यूमर का. किसी ने उन्हें छात्र जीवन की फिक्र का शिकार कहा तो किसी ने ‘वोल्फ-पार्किंसन-व्हाइट’ नाम की बीमारी की मरीज़. वो टेस्ट कराते कराते हैरान-परेशान हो चुकी थीं. कभी डॉक्टरों के चक्कर और कभी अस्पताल में भर्ती होकर इवा ने कोशिश की कि उन्हें अपनी हैरानी-परेशानी-फिक्रमंदी भरी ज़िंदगी में राहत मिले. मगर ऐसा हो ही नहीं रहा था.

तमाम टेस्ट के बाद डॉक्टर उन्हें यही बताते थे कि उन्हें डायबिटीज़ नहीं है, सिफलिस नहीं, एड्स नहीं, लीवर कैंसर नहीं. बाद में उन्हें ‘वोल्फ-पार्किंसन-व्हाइट’ नाम की बीमारी से भी क्लीन चिट मिल गई. मगर जो तनाव, जो चक्कर आने, प्यास लगने, सोते-सोते अचानक से उठने की दिक़्क़त उन्हें थी वो दूर ही नहीं हो रही थी.

एक बार तो सैन फ्रैंसिस्को शहर के मशहूर गोल्डेन गेट ब्रिज से गुज़रते वक़्त उन्हें ऐसा लगा कि मौत बस उन्हें अपने साथ ले जाने वाली है. उस वक़्त वो एंबुलेंस से अस्पताल जा रही थीं.

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आख़िर में जब इवा के दिमाग़ का एमआरआई हुआ तो पता चला कि उनके दिमाग़ के एक हिस्से से खून का रिसाव हुआ था. इवा के अगले कुछ साल किसी सास-बहू सीरियल जैसे ट्विस्ट के साथ गुज़रे. जहां पर सस्पेंस था. थ्रिल भी था. ब्रेन ट्यूमर से लेकर गर्भाशय के कैंसर जैसी बीमारियों की आशंका थी.

बीमारी और इलाज से बेहाल इवा ने शादी कर ली और वो एरिज़ोना में जाकर रहने लगीं. लेकिन राहत उससे भी नहीं मिली. वो वापस कैलिफोर्निया आकर रहने लगीं.

कैलिफ़ोर्निया में एक डॉक्टर ने बताया कि इवा को मास सेल एक्टिवेशन नाम की दिक़्क़त है. जिसमें उनके शरीर की कुछ कोशिकाएं, ज़्यादा केमिकल छोड़ रही हैं.

बरसों बाद इवा अब बिना किसी टेस्ट के, बिना किसी इलाज के रह रही हैं. उन्हें काफ़ी आराम है. लेकिन आज भी इवा को अपनी ज़िंदगी और मौत के बीच ज़्यादा फ़ासला नज़र नहीं आता. इसी वजह से ज़िंदगी के प्रति उनका नज़रिया काफ़ी बदल गया है.

अब इवा आज में, इसी पल में जीती हैं. वो बरसों बाद की योजानाएं नहीं बनातीं. हद से हद हफ़्ते दो हफ़्ते की प्लानिंग करती हैं.

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वैज्ञानिक कहते हैं कि मौत का ख़याल हमारी सोच पर गहरा असर डालता है. जैसे ही किसी को अपनी मौत के क़रीब होने का एहसास होता है, वो ज़िंदगी की अहमियत को ज़्यादा गहराई से समझने लगता है. वो इंसान हर पल को जीने लगता है.

यूं तो किसी की मौत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. मगर आजकल कुछ वेबसाइट हैं जो आपकी मौत की तारीख़ और वक़्त बताने के दावे करती हैं. कुछ बीमा कंपनियां भी अपने ग्राहकों की संभावित उम्र का अंदाज़ा लगाती हैं. वैज्ञानिकों को इन दावों में कोई वज़न नहीं दिखता. मगर, इस वजह से लोगों की सोच बदल जाती है. वो ज़िंदगी का भरपूर लुत्फ़ उठाने की कोशिश करते हैं.

मौत का अंदाज़ा होते ही आपके ख़यालों में बड़ा फ़र्क़ आ जाता है. लोग ज़्यादा धार्मिक हो जाते हैं. ज़्यादा हमलावर हो जाते हैं.

अगर आगे चलकर विज्ञान इतनी तरक़्क़ी कर ले कि इंसान की मौत की भविष्यवाणी की जा सके, तो क्या हमारी सोच बदल जाएगी?

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वैसे भी मौत को दूर खड़ी देखकर दूसरी सोच होती है. क्योंकि पता तो सबको होता है कि मौत आनी है. लेकिन, जब आपको ये मालूम हो कि आप अगले कुछ घंटों, दिनों या हफ़्तों में गुज़र जाने वाले हैं, तो आपका नज़रिया एकदम अलग होगा.

इवा की ही मिसाल लीजिए, क़रीब दस सालों तक वो मौत के डर में जीती रहीं. कोई उन्हें बीमारी नहीं बता पा रहा था. यूं लगता था कि वो बस ये दुनिया छोड़कर जाने वाली हैं. इसीलिए वो आज खुलकर जीती हैं. जब भी ज़ोर से हंसती हैं, इसे याद रखती हैं कि किसी ख़ास पल को उन्होंने कैसे महसूस किया था, जिया था.

यूं तो बहुत से लोग ये मशविरा देते हैं कि हर दिन को ज़िंदगी के आख़िरी दिन की तरह दजीना चाहिए. एप्पल के स्टीव जॉब्स की मिसाल हर कोई देता है, जो रोज़ आईने के सामने खड़े होकर ख़ुद को याद दिलाते थे कि आज अगर ज़िंदगी का आख़िरी दिन होता तो वो इसे कैसे गुज़ारते.

मगर, मौत के साए में जीना हमारी सोच को बदल देता है. हम लंबी योजनाएं बनाने के बजाय, आज में जीना शुरू करते हैं. हर पल का मज़ा लेने की कोशिश करते हैं.

यानी मौत के ख़ौफ़ में ही ज़िंदगी का लुत्फ़ है.

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